यह कविता रणथंभौर को एक साधारण वन्य क्षेत्र नहीं, बल्कि वीरता, इतिहास, भक्ति और प्रकृति के सम्मिलन की भूमि के रूप में प्रस्तुत करती है। यह कविता वीरगाथा काव्य, प्रकृति वर्णन और प्रतीकात्मकता का विलक्षण समागम है जो पाठक को भावनात्मक और बौद्धिक रूप से आंदोलित करता है।
दिनाँक 03/10/2020 को प्रसिद्ध सूर्य मंदिर, बुढादीत में राष्ट्रीय रचनाकार शिक्षक प्रगति मंच के तत्वाधान में युवा कवि किशन 'प्रणय' की पहले सद्य काव्य संग्रह का लोकार्पण गरिमामय समारोह में सम्पन्न हुआ । समारोह की अध्यक्षता महात्मा गाँधी राजकीय विद्यालय (अंग्रेजी माध्यम) मल्टीपरपज, कोटा के प्रधानाचार्य श्री राहुल शर्मा ने की । मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार श्री अम्बिका दत्त चतुर्वेदी थे। विशिष्ट अतिथि आकाशवाणी के वरिष्ठ उद्घोषक, कवि और साहित्यकार श्री रामनारायण हलधर, केंद्रीय साहित्य अकादमी से सम्मानित कवि श्री सी.एल. सांखला, कवि व गीतकार श्री प्रेमशंकर शास्त्री, कवि श्री प्रेममेघ थे।
यह कविता “बूढ़े गिद्धों” के रूप में एक प्रखर प्रतीकात्मक व्यंग्य है, जो समाज में गहराई से फैली मृत विचारधाराओं, भ्रष्ट सत्ताओं और धूर्त नेतृत्व की आलोचना करती है। यह रचना न सिर्फ राजनीतिक और सामाजिक यथार्थ को उजागर करती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि कैसे सत्ता के रक्षक खुद भक्षणकर्ता बन चुके हैं।
यह कविता समय, प्रतीक्षा, प्रेम और अनुभूति के गहरे बुनावट से रची एक आंतरिक यात्रा है — जहाँ कवि रुक जाने की कला और उस रुकने में छिपी भावना को प्रेम के धरातल पर बारीकी से पकड़ता है। यह कविता प्रेयसी के अस्तित्व के क्षण में ठहरे हुए प्रणय की कविता है, जिसमें प्रतीक्षा भी है, सम्मोहन भी है और आत्मस्वीकृति भी।
ग्रासरूट मीडिया के सहयोग से कोटा यूनिवर्सिटी के कुलपति सचिवालय सेमिनार हॉल में 3 सितंबर को किशन प्रणय की हिन्दी की पुस्तक प्रणय की प्रेयसी का लोकार्पण और पुस्तक चर्चा का आयोजन हुआ जिसमें माननीय अतिथि प्रख्यात कवि आलोचक कृष्ण कल्पित, ग्रासरूट मीडिया और आखर राजस्थान के संयोजक प्रमोद शर्मा और वरिष्ठ आलोचक कुंदन माली सम्मिलित रहें। कार्यक्रम के संयोजक विश्वविद्यालय के खेल निदेशक डॉ विजय सिंह थे और कार्यक्रम का संयोजन वरिष्ठ समीक्षक विजय जोशी द्वारा किया गया।
"जुलाई का पहला सप्ताह और सरकारी स्कूल" — यह कविता सिर्फ बरसात और स्कूल के दृश्य नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की परतें खोलती है जहाँ शिक्षक मौसम के साथ-साथ जिम्मेदारियों की बौछार में भीगते हैं। हर टपकती छत, हर सीलनभरी दीवार, और हर नियुक्ति पत्र के पीछे छिपा है एक मौन संघर्ष — एक शिक्षक का।
"अब पेड़ उतने ऊँचे नहीं रहे" — यह कविता सिर्फ पेड़ों की बात नहीं करती, यह समय, समाज और रिश्तों की ऊँचाइयों के कम हो जाने की कहानी है। पेड़ों की घटती छांव, सूखते तालाब, और गिरते गुरु — सब एक ही प्रतीक हैं, बदलते मूल्यों और खोती संवेदनाओं के।